संघर्ष से समाजसेवा तक: उज्ज्वल मंथन भारत सेवा फाउंडेशन की संस्थापिका सोनिया शर्मा की प्रेरक जीवन-यात्रा

0 Sonia Sharma (Founder, UMBS Foundation)
कुछ लोग अपना जीवन केवल अपने लिए जीते हैं, जबकि कुछ लोग दूसरों के जीवन में उम्मीद का प्रकाश बन जाते हैं।

दिल्ली की भागती-दौड़ती जिंदगी के बीच एक महिला ने अपने हृदय में उठी संवेदना को केवल एक भावना बनाकर नहीं छोड़ा, बल्कि उसे मानवता की सेवा का संकल्प बना दिया। यह कहानी है सोनिया शर्मा की, जिन्होंने जरूरतमंद लोगों की पीड़ा को समझते हुए समाजसेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया और आगे चलकर उज्ज्वल मंथन भारत सेवा फाउंडेशन की स्थापना की।

जब मन में सेवा का पहला दीप जला

दक्षिण दिल्ली के नेब सराय क्षेत्र में रहने वाली सोनिया शर्मा का जीवन भी कभी एक सामान्य महिला की तरह परिवार और दैनिक जिम्मेदारियों के बीच चल रहा था। उन्होंने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से बी.ए. और उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी से एम.ए. की शिक्षा प्राप्त की।

शिक्षा ने उन्हें आगे बढ़ने की समझ दी, जबकि परिवार से मिले संस्कारों ने दूसरों का दुःख महसूस करने वाला संवेदनशील हृदय दिया। उनकी माता ने उनके जीवन और सामाजिक कार्यों में सबसे बड़े प्रेरणास्रोत की भूमिका निभाई। माता का विश्वास, मार्गदर्शन और प्रोत्साहन उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का साहस देता रहा।

परिवार से मिले संस्कारों ने उनके भीतर सेवा का भाव जगाया और शिक्षा ने उस भावना को सही दिशा प्रदान की।

अस्पताल का वह दृश्य जिसने जीवन बदल दिया

सोनिया शर्मा के पड़ोस में रहने वाला एक छोटा बच्चा कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित था। बीमारी की जानकारी मिलते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। अस्पतालों के चक्कर, उपचार का बढ़ता खर्च और बच्चे की बिगड़ती स्थिति पूरे परिवार को भीतर से कमजोर कर रही थी।

सोनिया उस परिवार की पीड़ा देखकर चुप नहीं रह सकीं। वे कई बार बच्चे के साथ अस्पताल गईं, उसके लिए रक्त की व्यवस्था करने में सहयोग किया और कठिन समय में परिवार का मनोबल बढ़ाया। बच्चे को हिम्मत देते हुए वे स्वयं भी भावुक हो जाती थीं।

अस्पताल के गलियारों में उन्होंने केवल उस एक बच्चे की पीड़ा नहीं देखी। वहाँ कोई दवा के लिए परेशान था, कोई उपचार का खर्च जुटाने में असमर्थ था और कोई अपने प्रियजन के लिए रक्तदाता तलाश रहा था। अनेक परिवार आर्थिक अभाव, मानसिक तनाव और सामाजिक असहायता से संघर्ष कर रहे थे।

उसी समय सोनिया शर्मा ने मन में संकल्प लिया—यदि ईश्वर ने उन्हें किसी की सहायता करने योग्य बनाया है, तो उनकी सामर्थ्य केवल अपने जीवन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।

बिना नाम और प्रचार के शुरू हुई समाजसेवा

उस घटना के बाद सोनिया शर्मा ने समाजसेवा के लिए किसी बड़े मंच, पद या प्रसिद्धि की प्रतीक्षा नहीं की। जहाँ भी जरूरत दिखाई देती, वे अपने सामर्थ्य के अनुसार सहायता करने पहुँच जातीं। किसी परिवार के घर राशन नहीं होता तो भोजन की व्यवस्था करतीं, किसी गरीब बच्चे के पास कॉपी-किताबें नहीं होतीं तो शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध करातीं और किसी मरीज को रक्त चाहिए होता तो रक्तदाता खोजने में मदद करतीं।

लगभग दस–बारह वर्षों तक उनका यह सेवा-सफर व्यक्तिगत स्तर पर चलता रहा। इस दौरान उन्होंने समझा कि जरूरत केवल धन की नहीं होती। किसी को शिक्षा चाहिए, किसी को उपचार, किसी को मार्गदर्शन और किसी अकेले व्यक्ति को केवल अपनापन चाहिए।

वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों से मिलना उनके सामाजिक जीवन का अत्यंत संवेदनशील अनुभव रहा। वहाँ उन्हें ऐसे बुजुर्ग भी मिले जिनके पास सुविधाओं की कमी नहीं थी, लेकिन परिवार का साथ नहीं था। जब सोनिया उनके साथ बैठतीं, उनकी बातें सुनतीं और उनका हालचाल पूछतीं तो बुजुर्गों के चेहरे पर संतोष दिखाई देता।

उन्होंने जाना कि हर सेवा पैसे से नहीं होती—कभी किसी की बात सुनना और उसका हाथ पकड़ना भी बड़ी सेवा बन जाता है।

एक बेटी की विदाई और खुशी के आँसू

समाजसेवा के दौरान सोनिया शर्मा को अनेक अनुभव मिले, लेकिन एक निर्धन परिवार की बेटी का विवाह उनके जीवन की सबसे भावुक स्मृतियों में शामिल है। परिवार अपनी बेटी का विवाह करना चाहता था, लेकिन आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि आवश्यक सामग्री जुटाना भी कठिन हो रहा था।

सोनिया को जब उस परिवार की स्थिति की जानकारी मिली तो उन्होंने सहयोगियों के साथ मिलकर सहायता का प्रयास शुरू किया। विवाह की आवश्यक सामग्री और यथासंभव आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराया गया। धीरे-धीरे परिवार की चिंता आशा और प्रसन्नता में बदलने लगी।

विवाह संपन्न होने के बाद विदाई के समय बेटी के माता-पिता ने सोनिया को गले लगाकर आशीर्वाद दिया। उनकी आँखों में कृतज्ञता के आँसू थे। उस क्षण सोनिया ने अनुभव किया कि किसी परिवार की चिंता कम करना और किसी बेटी की खुशी का माध्यम बनना किसी बड़े सम्मान से कम नहीं है।

व्यक्तिगत संकल्प ने संस्था का रूप लिया

समय के साथ सहायता की आवश्यकता रखने वाले लोगों की संख्या बढ़ने लगी। सोनिया हर जरूरतमंद तक पहुँचना चाहती थीं, लेकिन व्यक्तिगत प्रयासों की अपनी सीमाएँ थीं। कई बार आवश्यकता बहुत बड़ी होती और उपलब्ध साधन कम पड़ जाते।

तब उन्होंने महसूस किया कि यदि संवेदनशील नागरिकों, समाजसेवियों और स्वयंसेवकों को एक मंच पर जोड़ा जाए तो सेवा का दायरा बढ़ाया जा सकता है। लंबे विचार-विमर्श और तैयारी के बाद 3 अगस्त 2025 को उज्ज्वल मंथन भारत सेवा फाउंडेशन की स्थापना की गई।

संस्था के नाम में ही उसका उद्देश्य छिपा है—समाज में सकारात्मक विचारों का मंथन करना और सेवा के माध्यम से जरूरतमंद लोगों के जीवन में उजाला लाना। इसकी स्थापना किसी पद, प्रतिष्ठा या प्रसिद्धि के लिए नहीं, बल्कि वर्षों से चल रहे सेवा कार्यों को संगठित, पारदर्शी और व्यापक स्वरूप देने के लिए की गई।

उज्ज्वल मंथन भारत सेवा फाउंडेशन के सामाजिक सेवा कार्य
उज्ज्वल मंथन भारत सेवा फाउंडेशन के माध्यम से जनसेवा का संकल्प

सेवा के अनेक क्षेत्र, लेकिन उद्देश्य एक

उज्ज्वल मंथन भारत सेवा फाउंडेशन शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, रक्तदान जागरूकता, बाल सुरक्षा, राशन वितरण, पर्यावरण संरक्षण, गौसेवा और सामाजिक जागरूकता के क्षेत्र में कार्य कर रहा है।

शिक्षा: आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को कॉपियाँ, पुस्तकें और अन्य शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराना तथा उनकी पढ़ाई जारी रखने में सहयोग करना।
महिला सशक्तिकरण: महिलाओं को अपनी शक्ति पहचानने, आत्मनिर्भर बनने और समाज निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करना।
रक्तदान जागरूकता: युवाओं और नागरिकों को स्वैच्छिक रक्तदान के लिए प्रेरित करना तथा जरूरतमंद मरीजों के लिए रक्त की व्यवस्था में सहयोग देना।
पर्यावरण संरक्षण: पौधारोपण, स्वच्छता और प्रकृति संरक्षण के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के लिए हरित एवं सुरक्षित भविष्य का संदेश देना।
गौसेवा: भारतीय संस्कृति में करुणा और सेवा की प्रतीक गौमाता की सेवा करना तथा गौशालाओं के सहयोग के लिए समाज को प्रेरित करना।
सोनिया शर्मा द्वारा गौसेवा
भारतीय संस्कृति, करुणा और जीव सेवा के प्रति समर्पण

चुनौतियों के बीच सम्मान और जीवन के बाद भी सेवा

संस्था बनने के बाद जिम्मेदारियाँ और बढ़ गईं। कई बार सहायता मांगने वाले लोगों की संख्या अधिक होती, लेकिन आर्थिक संसाधन सीमित होते। कहीं किसी बच्चे की फीस जमा करनी होती, कहीं बीमार व्यक्ति को तत्काल सहायता चाहिए होती और कहीं किसी जरूरतमंद परिवार के घर राशन पहुँचाना होता।

सोनिया शर्मा ने संसाधनों की कमी को अपने संकल्प की कमजोरी नहीं बनने दिया। उनकी माता का सहयोग, स्वयंसेवकों का साथ और समाज का विश्वास उन्हें लगातार आगे बढ़ने की शक्ति देता रहा। उनका मानना है कि छोटी सहायता भी किसी जरूरतमंद के लिए बहुत बड़ा सहारा बन सकती है।

समाजसेवा, रक्तदान जागरूकता, महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें उत्कृष्ट सेवा पुरस्कार, आइकॉनिक वूमेन अवॉर्ड, राष्ट्रीय रक्त योद्धा पुरस्कार, एसडब्ल्यूडीटी ब्लड वॉरियर अवॉर्ड, नेशनल सेव द ह्यूमैनिटी अवॉर्ड, धर्म एवं पर्यावरण सम्मान तथा वीर बिरसा मुंडा अंतरराष्ट्रीय रक्तदाता सम्मान सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया है।

इन सम्मानों के बावजूद उनकी सोच सेवा पर केंद्रित है। वे सम्मान को मंजिल नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी बढ़ाने वाला प्रोत्साहन मानती हैं।

रक्तदान, अंगदान एवं देहदान का संकल्प
सोनिया शर्मा नियमित रक्तदान के साथ समाज को रक्तदान के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने अंगदान के लिए पंजीकरण कराया है तथा दधीचि देह दान समिति, नई दिल्ली के माध्यम से देहदान का संकल्प भी लिया है। उनका विश्वास है कि मृत्यु के बाद भी शरीर किसी जरूरतमंद के जीवन और चिकित्सा शिक्षा के लिए उपयोगी बन सकता है।

नई पीढ़ी के नाम संदेश

सोनिया शर्मा युवाओं से नशे से दूर रहने, महिलाओं का सम्मान करने, सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग करने और रक्तदान, पर्यावरण संरक्षण तथा जनसेवा जैसे अभियानों से जुड़ने की अपील करती हैं। महिलाओं के लिए उनका संदेश है कि वे अपनी क्षमताओं को पहचानें, आत्मनिर्भर बनें और समाज निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएँ।

उनकी जीवन-यात्रा यह सिद्ध करती है कि समाज को बदलने के लिए हमेशा अपार धन, बड़ा पद या विशाल संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। परिवर्तन की शुरुआत उसी क्षण हो जाती है जब कोई व्यक्ति दूसरे के दुःख को देखकर मुँह मोड़ने के बजाय सहायता के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाता है।

सेवा का एक दीपक, हजारों जीवन में उजाला

कैंसर से पीड़ित एक छोटे बच्चे की पीड़ा से शुरू हुआ सोनिया शर्मा का सेवा-सफर आज उज्ज्वल मंथन भारत सेवा फाउंडेशन के रूप में अनेक लोगों के जीवन में आशा जगा रहा है। यह केवल एक संस्था की स्थापना की कहानी नहीं, बल्कि एक संवेदनशील महिला के उस संकल्प की कहानी है जिसने सीमित संसाधनों और अनेक चुनौतियों के बावजूद मानव सेवा का मार्ग चुना।

यदि मन में संवेदना, इरादों में ईमानदारी और कदमों में निरंतरता हो, तो सेवा का एक छोटा-सा दीपक भी हजारों जिंदगियों में उजाला कर सकता है।

सेवा ही संकल्प — मानवता ही धर्म 

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