आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कार भी जरूरी: बच्चों को आदर्श नागरिक बनाने की सीख

0 Sonia Sharma (Founder, UMBS Foundation)


बदलता बचपन

दिल्ली के एक परिवार में 12 वर्ष का विवान रहता था। उसके माता-पिता दोनों नौकरी करते थे। घर में हर सुविधा थी—महंगा मोबाइल, टैबलेट, वीडियो गेम और इंटरनेट। लेकिन एक चीज़ की कमी थी, वह थी परिवार के साथ समय।

विवान सुबह उठते ही मोबाइल देखता, खाना खाते समय भी वीडियो चलता रहता और रात को देर तक गेम खेलता। वह अपने दादा-दादी की बातों पर ध्यान नहीं देता था। नमस्ते करना, बड़ों का सम्मान करना और घर के छोटे-छोटे कामों में हाथ बँटाना उसे पुरानी बातें लगती थीं।

माता-पिता ने कई बार समझाया, लेकिन उसने किसी की बात नहीं मानी। धीरे-धीरे उसका स्वभाव चिड़चिड़ा और गुस्सैल हो गया।

संस्कारों की कमी का असर

एक दिन स्कूल में शिक्षक ने बच्चों से कहा कि वे अपने माता-पिता और दादा-दादी के बारे में दो मिनट बोलें।

जब विवान की बारी आई तो वह कुछ भी नहीं बोल पाया, क्योंकि उसने कभी उनके साथ समय ही नहीं बिताया था।

उसके सहपाठी अपने परिवार के संस्कार, कहानियाँ और सीख बताते रहे। विवान को पहली बार एहसास हुआ कि उसके पास सुविधाएँ तो हैं, लेकिन परिवार से जुड़ाव नहीं।

उस दिन वह चुपचाप घर लौटा।


एक घटना जिसने बदल दिया सब कुछ

कुछ दिनों बाद दादाजी की तबीयत अचानक खराब हो गई। घर में सभी परेशान थे, लेकिन विवान अपने मोबाइल में व्यस्त था।

दादाजी ने धीरे से कहा, "बेटा, पाँच मिनट मेरे पास बैठ जाओ।"

विवान ने बिना देखे जवाब दिया, "अभी नहीं, मैं गेम खेल रहा हूँ।"

कुछ देर बाद दादाजी अस्पताल चले गए।

जब विवान अस्पताल पहुँचा तो उसने दादाजी को कमजोर हालत में देखा। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा।

दादाजी की सीख

दादाजी ने मुस्कुराकर उसका हाथ पकड़ा और बोले,

"बेटा, मोबाइल बुरा नहीं है, लेकिन यदि वह परिवार, पढ़ाई और संस्कारों से दूर कर दे, तो वह सबसे बड़ी परेशानी बन जाता है।"

उन्होंने आगे कहा,

"बड़ों का सम्मान, छोटों से प्रेम, सत्य बोलना, समय का मूल्य समझना और दूसरों की मदद करना—यही असली संस्कार हैं। यही तुम्हें जीवन में बड़ा इंसान बनाएँगे।"

विवान ने पहली बार ध्यान से उनकी बातें सुनीं।

नया परिवर्तन

अगले दिन से विवान ने अपनी दिनचर्या बदल दी।

वह सुबह उठकर सबसे पहले माता-पिता और दादा-दादी को प्रणाम करता। मोबाइल का समय कम कर दिया। पढ़ाई पर ध्यान देने लगा।

शाम को दादाजी से प्रेरणादायक कहानियाँ सुनता और छुट्टी के दिन उनके साथ पार्क जाता।

घर के छोटे-छोटे कामों में भी मदद करने लगा।

धीरे-धीरे उसका व्यवहार इतना अच्छा हो गया कि स्कूल के शिक्षक भी उसकी प्रशंसा करने लगे।


संस्कार ही सबसे बड़ी पहचान

वार्षिक समारोह में विद्यालय ने "श्रेष्ठ संस्कारी विद्यार्थी" का पुरस्कार घोषित किया।

सभी बच्चों को आश्चर्य हुआ जब मंच पर विवान का नाम पुकारा गया।

प्रधानाचार्य ने कहा,

"अच्छे अंक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अच्छे संस्कार उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हैं। जो बच्चा अपने परिवार, गुरु और समाज का सम्मान करता है, वही भविष्य का आदर्श नागरिक बनता है।"

विवान ने पुरस्कार अपने दादा-दादी के चरणों में रख दिया और कहा,

"आज जो भी हूँ, आपके संस्कारों की वजह से हूँ।"

पूरा सभागार तालियों से गूँज उठा।

शिक्षा 

आज के समय में बच्चों के पास आधुनिक सुविधाएँ, मोबाइल और इंटरनेट तो हैं, लेकिन यदि उनके साथ अच्छे संस्कार न हों तो ये सुविधाएँ उनके व्यक्तित्व को कमजोर बना सकती हैं। माता-पिता, दादा-दादी और गुरुजनों का सम्मान करना, समय का सदुपयोग करना, सत्य बोलना, विनम्र रहना और दूसरों की सहायता करना ही वास्तविक संस्कार हैं। तकनीक का उपयोग ज्ञान और विकास के लिए होना चाहिए, न कि परिवार से दूरी बनाने के लिए। बच्चों को चाहिए कि वे प्रतिदिन कुछ समय अपने परिवार के साथ बिताएँ, बड़ों का आशीर्वाद लें और उनकी सीख को अपने जीवन में अपनाएँ। अच्छे संस्कार ही व्यक्ति की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। धन, पद और प्रसिद्धि समय के साथ बदल सकते हैं, लेकिन अच्छा चरित्र और संस्कार जीवनभर सम्मान दिलाते हैं। इसलिए हर बच्चे को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति को भी अपनाना चाहिए, क्योंकि यही उसे एक सफल, जिम्मेदार और आदर्श नागरिक बनाते हैं।


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